Wednesday, 29 August 2018

आखिर आ ही गया..

(प्यार के परिंदों के लिए ये गीत)

आखिर आ ही गया...

तुमसे किया वादा
मेरे साथ रहा तेरा साया
पर्वत-नदी पार कर
दिन-रात पुकार कर
आखिर आ ही गया...










दिल भी क्या चीज है
ना देखूं तो मिलने की ख्वाहिश है
देख लूं तो खामोशी छाई है
वही तन्हाई बयां करने 
आया हूं..

जानता हूं 
फासलों का इम्तिहान
समझता हूं
बंदिशों का मान
आशिक हूं, आवारा हूं, खुदगर्ज नहीं
ठुकरा भी दो तो हर्ज नहीं
कहने यही आया हूं ...

- निशांत कुमार






Saturday, 25 August 2018

नारी तुम्हें शक्ति जगानी होगी

फोटो साभार-google
जगत तुम, जननी मैं
फिर एक पर बंधन क्यों ?
साथ खेले, साथ हुए बड़े
फिर चौखट पर लकीर क्यों  ?

पुरुषार्थ का पाखंड बहुत हुआ
उत्थान के भागीदार हम भी
चूल्हा-चौका नहीं, उससे भी ज्यादा
करने का कर लिया इरादा

जंगल में शिकार की तरह
ज़िस्म को घूरते, भेदते रहते हो
आंखों को नहीं आती लाज
तब मर्यादा नहीं आती याद

साड़ी, समीज के बाद अब फ्रॉक
डायपर पहनी पहुंच रही यमलोक
आबरू का ये क्या अंजाम हुआ ?
क्या रक्षाबंधन नाकाम हुआ ?

बाजू को अब खुद ही उठाना होगा
सिर काट कर काली कहलाना होगा
महिषासुर की धाती भेदनी होगी
नारी तुम्हें शक्ति जगानी होगी 

कब तक सीता बनकर अग्निपरीक्षा दोगी ?
सति बनकर मर्यादा का बोझ ढोओगी
राधा और मीरा की भूमिका का दौर नहीं
दुर्गा हो तुम,  तुमसे बड़ा कोई और नहीं

लाज का ताज नारी के हवाले
मान का मुकुट नर के पाले
सभ्यता की जब ऐसी रीत रही
दु:शासनों की यही जीत रही

जन्म देना ही बड़ा एहसान है
मां से बड़ा क्या नाम है?
बहन की मुस्कान संसार है
भाई तुम्हें किस बात का अभिमान है?

पुरुष से प्रतिस्पर्धा नहीं
श्रद्धा का मान चाहिए
कदम मिलाकर चलने का
स्वाभिमान चाहिए

- निशांत कुमार



Tuesday, 21 August 2018

जल का युद्ध घोष

फोटो साभार- Deccan Chronicle
(केरल बाढ़ त्रासदी पर कविता)
धरा भरी है
डर की घड़ी है
ये जल का युद्ध घोष है
मनुष्य बता किसका दोष है ?

बूंदे बेरहम हो गई
खेत की रौनक ले गई
बचे बाजुओं में वो दम कहां ?
नीर को रोके, वो कृष्ण कहां ?

घन का कोप 
सरि की विवशता
अरण्य को लूटने वाले  
जीवों में श्रेष्ठ तुम कैसे कहलाए ?

नदियों को तुमने बंदी बनाया
स्वार्थ में सबका मज़ाक उड़ाया
तुम प्रलय को ललकारते रहे
विज्ञान से उसे डराते रहे

कैसा मंजर अब पसर रहा ?
कचरा घर में सड़ रहा
पड़ गए हैं शक्य के लाले
हाथों में हैं गंदे पानी के प्याले

जीवन तुम्हे बख्स देंगे
करो वादा, अति नहीं करेंगे
सत्व तुम्हारी जगत पर नही चलेगी
मनमानी पर सज़ा मिलेगी

- निशांत कुमार

.....................................
शक्य- अनाज
कोप- गुस्सा
घन- बादल
सरि- नदी
सत्व- जोर





Sunday, 19 August 2018

आज ही आया था गुलामी का पहला सिक्का

19 अगस्त 1666 को औरंगजेब की कैद से शिवाजी मुक्त हुए! शिवाजी फल की टोकरी में छिपकर बाहर निकले !
और इसी दिन,कलकत्ता (अब कोलकाता) में 19 अगस्त 1757 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहला सिक्का ढाला । भारत में  सिक्के तो पहले भी बने । लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी इसे चलन में ले आई ।

बंगाल के नवाब के साथ एक संधि के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी ने साल 1757 में टकसाल बनाई थी ।  तब कंपनी को बिहार और बंगाल में कमाई करने के अधिकार दिए गए थे ।
तब उत्तर भारत के अधिकांश इलाकों पर मुगलों का राज था । उसके बाद मराठा और राजपूत का वर्चस्व था । ईस्ट इंडिया कंपनी के दायरे में मद्रास प्रेसिडेंसी, बॉम्बे प्रेसिडेंसी और बंगाल प्रेसिडेंसी थे । इसलिए यहां  इन्होंने अपने सिक्के जारी किए । ब्रिटिश सिक्के साल 1950 तक देश में चलन में थे ।

कुछ समय तक भारत में 'आना' सिस्टम चला जिसमें- 1 आना, 2 आना, 1/2 आना के सिक्के चलते थे । एक रुपया 16 आना यानी 64 पैसे का मिलकर बनता था । एक आना का मतलब 4 पैसे होता था ।

एक पैसे का सिक्का 1957-1972 के बीच चलन में थे । इन पर 2011 में बैन लगा दिया गया ।
1964-1972 के बीच 3 पैसे के सिक्के ढाले गए । साल 2011 में इन्हें बंद कर दिया गया ।
1957-1994 के बीच 5 पैसे के सिक्के ढाले गए । 2011 में इन्हें भी चलने से बैन कर दिया गया ।
25 पैसा 1957-2002 के बीच ढाले जाते रहे । लेकिन तत्कालीन यूपीए सरकार ने चवन्नी को बंद कर दिया ।
साल 1962 से चलन  एक रुपये का सिक्का चलन में आया जो आज भी चलता है।

2 रुपये का सिक्का 1982 से चलन में आया और 5 रुपये का सिक्का 1992 से चलन में आया था । इसके अलावा साल 2006 से सरकार ने 10 रुपये का सिक्का भी देश में जारी कर दिया ।

8 नवंबर 2016 को तो भारत ने नोटबंदी भी हुई । 500 और 1 हजार के पुराने नोट चलन में बंद कर दिए गए । 500 और 2 हजार के नए नोट जारी किए गए । फिर 200 रुपए के नोट भी छपे ।



Saturday, 18 August 2018

अटल जी के वो अधूरे सपने..

फोटो साभार- The Hindu
ऐसा नहीं है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के सपने पूरे नहीं किए । उन्होंने कई फैसले लिए जो आज भी योजना के रुप में जारी हैं । लेकिन कुछ काम उनके अधूरे भी हैं । देश की प्रमुख नदियों में अटल जी की अस्थियां विसर्जित होंगी । मगर उनकी नदी जोड़ो योजना अधूरी है । ये उन सपनों में शामिल है जिसे अटल पूरा होते देखना चाहते थे- 

संविधान संशोधन का अधूरा सपना:
संविधान में संशोधन की आवश्यकता पर विचार करने के लिए 1 फरवरी, 2000 को संविधान समीक्षा के राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया । 6 महीने का वक्त दिया गया। उस वक्त ये अंदेशा जताया गया था कि जिस संविधान को तैयार करने में तीन साल के करीब वक्त लगा उसकी समीक्षा छह महीने में कैसे होगी ? लेकिन  249 सिफारिशें सामने आईं । सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश एम एन वेंकटचलाइया के अगुवाई वाले आयोग ने रिपोर्ट तैयार की थी । पर इसका बड़े पैमाने पर विरोध हुआ , जिसके बाद ये काम भी आगे नहीं बढ़ पाया ।

नदी जोड़ो योजना:
नदी जोड़ो योजना में गंगा सहित 60 नदियों को जोड़ने की योजना थी । इरादा था कि इससे कृषि योग्य लाखों हेक्टेयर भूमि की मानसून पर निर्भरता कम हो जाएगी । एक कार्य दल का गठन भी किया गया । परियोजना को दो भागों में बांटने की सिफारिश की गई । पहले हिस्से में दक्षिण भारतीय नदियां शामिल थीं जिन्हें जोड़कर 16 कड़ियों की एक ग्रिड बनाई जानी थी । दूसरे में  गंगा, ब्रह्मपुत्र और इनकी सहायक नदियों के पानी को इकट्ठा करने की योजना बनाई गई । लेकिन तब तक 2004 में यूपीए की सरकार आ गई ।  मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया ।

अयोध्या का हल:
साल 1999 से 2004 के दौरान एनडीए की सरकार में अटल ने अयोध्या बाबरी विवाद को सुलझाने के लिए कोशिशें शुरू की । कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वती ने साल 2010 में दावा किया था कि वह अयोध्या मामले का हल निकालने के करीब पहुंच गए । लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इससे जुड़ा मामला पहुंचने की वजह से ये खटाई में पड़ गई ।

पड़ोसी के साथ शांति:
21 फरवरी 1999 में पाकिस्तान में दिए अपने भाषण में अटल ने कहा था- पाकिस्तान फले फूले हम चाहते हैं और हम फलें-फूलें यह आप भी चाहते होंगे । इतिहास बदला जा सकता है, मगर भूगोल नहीं बदला जा सकता ।आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं बदल सकते, तो अच्छे पड़ोसी के नाते रहें। अटल ने रिश्ते सुधारने की दिशा में दिल्ली लाहौर बस सेवा शुरू की । खुद सवार होकर जोखिम भरा सफर तय कर पाकिस्तान पहुंचे । लेकिन बाद में उन्हें करगिल युद्ध का सामना करना पड़ा । फिर भी बड़ा दिल दिखाया युद्ध के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले परवेज मुशर्रफ़ को आगरा बुलाया ।

कश्मीर समस्या का हल:
कश्मीर को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी के फॉर्मूले की कई बार बात सामने आ चुकी है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने हालिया भाषण में कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए वाजपेयी के रास्ते पर चलने की बात कही है । माना जाता है कि आगरा शिखर सम्मेलन में मुशर्रफ़ और वाजपेयी ने कश्मीर की समस्या का हल निकाल ही लिया था । लेकिन ये भी सफल नहीं हो सका ।





Tuesday, 14 August 2018

तीन रंग और चक्र नहीं है ये, पूरा भारत है

ये सिर्फ रंग नहीं हैं । इसमें पूरा भारत है । केसरिया रंग  त्याग और बलिदान का प्रतीक है । सफेद रंग सत्य, शांति और प‌वित्रता का प्रतीक है । हरा रंग समृद्धता को दर्शाता है । और अशोक चक्र है न्याय का प्रतीक ।

आइए जानते हैं हमारे तिरंगे झंडे का सफर- 

7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कोलकाता में फहराया गया था । इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।


1906

1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में मैडम भीकाजी कामा ने दूसरा झंडा फहराया ।


1907
1917 में डॉक्टर एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने कोलकाता में होम रूल आंदोलन के दौरान तीसरा झंडा फहराया। 
1917
1921 में पिंगली वेंकैया ने हरे और लाल रंग का इस्तेमाल करते हुए झंडा तैयार किया । जो हिंदू और मुस्लिम वर्ग का प्रतीक था ।


1921
1921 में गांधी जी के सुझाव के बाद इसमें सफेद रंग की पट्टी और चक्र को जोड़ा गया, जो अन्य समुदाय के साथ देश की प्रगति का प्रतीक थे । फिर 1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर तिरंगे को अपना लिया...
1931
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। 


वर्तमान में



Monday, 13 August 2018

आज़ादी का पट्टा है



फोटो आभार- गूगल
स्वाद बहुत खट्टा है
आज़ादी का पट्टा है
बस साल गए बीत
उपनाम की वही है रीत

आरक्षण पर दंगल है
नारी पर सोच भी तो जंगल है
बस हाल की बची है खाल
वहीं पड़े है स्कूल-अस्पताल

अब भी बंटने का जख्म
 सुनते हैं वही सियासी नज़्म
टोपी-चंदन में बंट गए
आज़ाद सोच से कट गए

देशभक्ति का दौर देखो
गद्दार कहने की होड़ देखो
जिसने लड़ी मातृभूमि की जंग
उसी पर सियासत है बुलंद 

कर्कश बहुत स्वर है
फिर भी इस पर गर्व है
कौन है बदलने को तैयार ?
मन को दुखी करते ये विचार 

- निशांत कुमार




मेरी पहली किताब (MY FIRST BOOK)

साथियों, मैं ब्लॉग कम ही लिख पाता हूं, इसलिए नहीं कि लिखना नहीं चाहता । दरअसल मैंने लिखने का सारा वक्त अपनी किताब को दे दिया । एक विद्यार्थी...